इतिहास एवं परंपरा

हमारी विरासत

खाण्डल विप्र समाज की सात शताब्दियों की गौरवशाली यात्रा — वैदिक परंपरा, उत्पत्ति और सांस्कृतिक धरोहर।

परिचय

दिव्य आलोक का प्रसार

अखिल भारतीय खाण्डल विप्र महासभा द्वारा प्रज्वलित किया गया यह दिव्य आलोक सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैले खाण्डल विप्र (खण्डेलवाल ब्राह्मण) समाज के मार्गदर्शन हेतु स्थापित किया गया था। इसका प्रकाश कालांतर में हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र (हिंद महासागर) तक तथा पूर्वी सागर से लेकर नागालैंड तक फैल गया।

खाण्डल विप्र (खण्डेलवाल ब्राह्मण) समाज के मार्गदर्शन हेतु स्थापित यह तेजस्वी प्रकाश विगत सात शताब्दियों में अनेक झंझावातों एवं कठिनाइयों से प्रभावित होने के बावजूद आज भी अपनी उज्ज्वल किरणें चारों दिशाओं में बिखेर रहा है और भविष्य में भी समाज को आलोकित करता रहेगा।

उत्पत्ति

लोहागल तीर्थ और महायज्ञ

खाण्डल विप्र ब्राह्मण समाज, जिसे सामान्यतः खण्डेलवाल ब्राह्मण समाज के नाम से जाना जाता है, भारतवर्ष की अत्यंत प्राचीन एवं पूजनीय ब्राह्मण परंपराओं में से एक है। हमारी उत्पत्ति का संबंध भगवान परशुराम द्वारा अरावली पर्वतमाला की रमणीय घाटियों में स्थित पवित्र लोहागल तीर्थ पर संपन्न महायज्ञ से माना जाता है, जिसमें परम पूज्य महर्षि कश्यप ने आचार्य तथा महर्षि वशिष्ठ ने अध्वर्यु का दायित्व निभाया था।

संस्कृत परंपरा के अनुसार भगवान परशुरामजी ने लोहागल में एक ऋषि माता से प्राप्त दिव्य शक्ति के आधार पर यज्ञ सम्पन्न किया तथा उसमें विद्यमान पचास तेजस्वी ऋषिपुत्रों को यज्ञ का ऋत्विक बनाया। यज्ञ सम्पन्न होने के पश्चात् उन्होंने यज्ञ वेदी के पचास खंड कर प्रत्येक ऋषिपुत्र को एक-एक भाग प्रदान किया। इसी कारण उनका नाम "खंडल" प्रसिद्ध हुआ।

लोहागल तीर्थ — खाण्डल विप्र उत्पत्ति स्थल
खंडेला — खाण्डल विप्र समाज का मूल स्थान
विस्तार

खंडेला से सम्पूर्ण भारत तक

उस यज्ञ में सम्मिलित एवं उसका संचालन करने वाले तेजस्वी ऋषिगण आगे चलकर वर्तमान राजस्थान के सीकर जिले में स्थित ऐतिहासिक नगर खंडेला तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में बस गए और "खाण्डल विप्र" अर्थात "खंडेला के विप्र" कहलाए। इसका उल्लेख स्कंदपुराण के रेवाखंड में भी प्राप्त होता है।

शताब्दियों के क्रम में हमारे पूर्वजों ने वैदिक ज्ञान, धर्मनिष्ठ आचरण, विद्या एवं सेवा की उत्कृष्ट परंपरा को खंडेला से देश के कोने-कोने तक पहुँचाया। आज खाण्डल विप्र समाज साढ़े बहत्तर गोत्रों में संगठित है, प्रत्येक गोत्र की अपनी कुलदेवी है, और हमारे परिवार राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक सहित सम्पूर्ण भारत एवं विश्व के अनेक देशों में निवास कर रहे हैं।

शास्त्र प्रमाण

महाभारत एवं स्कंदपुराण के संदर्भ

प्राचीन ग्रंथों में खाण्डल विप्र समाज के उल्लेख एवं प्रमाण।

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महाभारत वनपर्व — अध्याय 117

खाण्डल ब्राह्मणों का उल्लेख महाभारत के वनपर्व अध्याय 117 में प्राप्त होता है। इसमें "कल्पानुमते ब्राह्मणा खंडतदा..." जैसे श्लोकों के माध्यम से खण्डवायन ब्राह्मणों का वर्णन मिलता है। यह उल्लेख खाण्डल विप्र समाज की प्राचीन वैदिक परंपरा एवं गौरवशाली इतिहास का प्रमाण माना जाता है।

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स्कंदपुराण — खंडे महागिरि माहात्म्य

स्कंदपुराण में खाण्डल विप्रों का विशेष वर्णन प्राप्त होता है। इसके अनुसार खाण्डल ब्राह्मण इस भूमंडल में विख्यात एवं देवताओं द्वारा भी पूजनीय माने गए हैं। यह वर्णन समाज की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा एवं धार्मिक महत्ता को दर्शाता है।

गोत्र प्रणाली

50 प्रमुख गोत्र / ऋषि गोत्र

खाण्डल विप्र समाज की प्रमुख शाखाएँ एवं उनकी ऋषि परंपराएँ।

क्र.सं. गोत्र / शाखा मूल गोत्र / ऋषि परंपरा विशेष / प्रवर
1 नवहाल आंगिरस आंगिरस गोत्र
2 डीडवाणा आंगिरस आंगिरस, गौतम, वशिष्ठ
3 गोरड़ा
4 बील जैमिनि जैमिनि गोत्र
5 नान-नानिया (निठारणा) जैमिनि तथा सांक्रित्य
6 पीपलवा पाराशर पाराशर गोत्र
7 गोथला पाराशर पाराशर-वशिष्ठ
8 मुछवाला
9 सिंहोटा कृष्णात्रेय कृष्णात्रेय गोत्र
10 गुंजवड़ा कृष्णात्रेय कृष्णात्रेय-त्रिवाक्य
11 सोमाला (तिवारी)
12 खड़भड़ा (निठुरा) कृत-कौशिक कृत कौशिक गोत्र
13 डाबड़ा / भुरटिया
14 बिलवाल विश्वामित्र कृश-कौशिक-वंधुल
15 सोड़वा / शिवोवाह कौशिक कौशिक-जमदग्नि
16 दुगोलिया
17 भाटीवाड़ा विश्वामित्र मरीचि-कैशिक
18 मंगलहरा गौतम गौतम गोत्र
19 टंकहारी / भूसरा गौतम गौतम-वशिष्ठ-वात्स्य
20 चोटिया वशिष्ठ वशिष्ठ गोत्र
21 भुवाल / पाराशल वशिष्ठ वशिष्ठ-सांक्रित्य
22 मंगरा सांक्रिति सांक्रिति गोत्र
23 कुंजवाड़ा अत्राहार अत्राहार-सांक्रित्य
24 माठोलिया जमदग्नि जमदग्नि गोत्र
25 साकुनिया जमदग्नि जमदग्नि-वशिष्ठ
26 वाटोलिया आपद आपद गोत्र
27 घाटवाल कौशिक कौशिक-रत्नकैशिक
28 बोहरा / भोहरा
29 बोचीवाल शांडिल्य शांडिल्य गोत्र
30 झुंझुनोदिया भारद्वाज भारद्वाज गोत्र
31 जोशी भारद्वाज भारद्वाज गोत्र
32 वाल / परवाल भारद्वाज भारद्वाज-गिर
33 सोती / लढ़ाणिया कश्यप कश्यप गोत्र
34 सठिणया (वाटण) कश्यप
35 सेवदा मुद्गल मुद्गल गोत्र
36 सामरा वनभाग-भुवन
37 झखनाड़िया बृहस्पति बृहस्पति गोत्र
38 अजमेरिया बृहस्पति बृहस्पति-कपिल
39 बंशीवाल वात्स्य वात्स्य गोत्र
40 चरया
41 नेन्थला कात्यायन कात्यायन गोत्र
42 भुरभुरा अत्रि अत्रि-भृगु-वशिष्ठ
43 बणसिया अत्रि अत्रि गोत्र
44 वठोठिया अत्रेय-शातातप
45 भढ़ाढरा कौंडिन्य कौंडिन्य गोत्र
46 गोवला गर्ग गर्ग गोत्र
47 रणवा अंगिरस-वात्स्य
48 काछवाल अगस्त्य अगस्त्य-दधीचि
49 सुंडरिया काश्यप कारव गोत्र
50 अन्य शाखाएँ विविध ऋषि परंपराएँ
विशेष टिप्पणी

वैदिक परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत

खाण्डल ब्राह्मणों की प्रमुख शाखा का वेद यजुर्वेद माना गया है। समाज की परंपरा वैदिक धर्म, धनुर्वेद, संस्कार, ज्ञान एवं सेवा की भावना पर आधारित रही है। यही आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत आज भी समाज को एकता, गौरव एवं धर्मनिष्ठ जीवन की प्रेरणा प्रदान करती है।

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